Saturday, 16 February 2013

How Judiciary system playing with the life of people.


शमसुद्दीन फक्रुद्दीन ये नाम उस शक्श का है, जिसको हमारे देश की न्याय प्रणाली और उसके रखवालो ने उसकी जिन्दगी के 11 महीने, बिना कोई जुर्म किये ही सलाकों के पीछे काटने पर मजबूर कर दिया । उत्तर प्रदेश के छोटे से शहर का शमसुद्दीन फक्रुद्दीन पर 200 रूपये की चोरी का आरोप था।  उन 200 रूपये की चोरी के आरोप की चार्जशीत फाइल करने में पुलिस को तीन महीने लगे। लेकिन तीन महीने बाद भी जमानत का कोई आता पता नहीं था। जैसे तैसे जब उसके केस की सुनवाई शुरू हुयी और जमानत की अपील की गयी तो जज साहब ने जमानत की कीमत (Bail bond) 10000 रूपये निर्धारित की । गरीब शमसुद्दीन फक्रुद्दीन जमानत की रकम नहीं चूका पाया और तब तक जेल में सड़ता रहा जब तक उसने जुर्म कबूल नहीं कर लिया । उसने 11 महीने जेल में उस जुर्म के लिए बिताये जिस जुर्म की सजा केवल तीन महीने होती है और वो शायद इसलिये क्योकि हमारी पुलिस , सरकारी वकील उसका जुर्म साबित नहीं कर पा रहे थे । शमसुद्दीन फक्रुद्दीन ने चोरी की थी या नहीं ये तो कहना मुस्किल है लेकिन इस बात में कोई दो राय नहीं है क़ि उसने जुर्म कबूल इसलिये किया था ताकि वो जेल से जल्दी छूट सके ।

मुझे यहाँ पर एक बात समझ नहीं आती की आखिर 200 रूपये की चोरी की जमानती रकम 10000 रूपये कैसे हो सकती है ?  माना के हमारे देश के सिस्टम में बहुत सारी कमिया है , पर क्या सारी कमिया सिस्टम में है । अगर सिस्टम को चलने वाले लोग ठीक से काम करने लगे तो हम सिस्टम ठीक नहीं हो जायेगा ? क्यों हमारे जजओ के लिए कोई समय सीमा नहीं है ? क्यों आरोपी को दोषी मान लिया जाता है और उसके समय का हिसाब नहीं रखा जाता ? जिस केस को तीन महीने में खत्म हो जाना चहिये था, उसके 11 महीने तक चलने पर क्यों किसी पुलिस या जज के खिलाफ कोई कदम नहीं उठाया गया ?

 
ये ऐसा इकलोता केस नहीं है , और भी न जाने कितने ही ऐसे केस दर्ज है जिनका फैसला कब आना है किसी को नहीं पता और बेचारे आरोपी जो शायद दोषी भी न हो सिर्फ अपनी बुरी किस्मत समझ के सालको के पीछे आपने दिन काट रहे है।

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