मैं छत्तीसगढ़ में रहकर भी उस स्थिति से वाकिफ न
था जो यहाँ नक्सली इलाको में चल रही है. लोगो का अपने हक के लिए सरकार से
बगावत करना, आये दिन CRPF जवानों और नक्सलियों का मुडभेड में मारा जाना और
इतना होने के बावजूद भी नेताओ को अपने स्विस बैंक के बैलेंस पर द्यान देना.
हमारे नेताओ ने आज तक ऐसा कोई नियम या कानून नहीं बनाया जिससे परियोजना
के कारण बेघर हुए लोगो को घर मिल सके, लेकिन हाँ जब वही लोग नक्सली बन गए
तो उनको आतंकवादी घोषित करने में जरा भी देरी नहीं बरती . उद्योगपतियों से
पैसा खाकर, अपने ही देश के लोगो की लाशो से बने बिस्तार पर सोते हुए क्या
हमारे नेताओ का दिल नहीं पसीजता ? क्या इस देश की हवा पानी में इतना दम
नहीं रहा की नेताओं के अंदर देशभक्ति की भावना उमड़ सके . क्या हमारे नेताओ
का खून इतना पानी हो गया है की अपने ही भाई बन्धुं से रोटी कपडा छीनते हुए
उनके हाथ नहीं कांपते. यही सब विचार जब चर्क्रव्युह मूवी देखते वक़्त दिमाग
में आये तो आखों से पानी आ गया.
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