Sunday, 19 May 2013

WHAT IPL IS GIVING TO OUR COUNTRY


विकसित देशो में होने वाले काउंटी टूर्नामेंट से प्रेरणा लेकर भारत में भी एक टूर्नामेंट की शुरुवात हुयी जिसका नाम है IPL . किसी विकसित देश के लिए IPL  जैसे टूर्नामेंट लाभकारी साबित हो सकते है लेकिन भारत जैसे विकासशील  देश के लिए इसके लाभ के बराबर है

हमारे देश के लोग सिर्फ दो ही चीज़ के दीवाने है एक तो क्रिकेट और दूसरा सिनेमा और अगर देश में नेताओं और उद्योगपतियों के बाद किसी के पास सबसे ज्यादा पैसा है , तो वो है हमारे बॉलीवुड के स्टार लोग वही पैसा आज  " आसान और जल्दीतरीको  से ओर ज्यादा पैसा बनाने के काम रहा है IPL भी ऐसा ही एक  "आसान ओर जल्दी " तरीको में से एक है पैसा कमाने के होड़ में कुछ खिलाडी तो इतने आगे बढ़ गए है की स्पॉट फिक्सिंग के केस  IPL  में आने शुरू हो गए है इस बात की कोई गारंटी नहीं है की एक भी मुकाबला इमानदारी से हुआ हो

IPL में हमारे देश के उद्योगपतियों और बॉलीवुड के स्टार लोगो ने लगभग US $ 1145.59 मिलियन यानि की 6384  करोड़ रुपए का निवेश किया हमारा देश को जिस गतिशील विकास की जरुरत है उसके लिए  6384  करोड़ रुपए बहुत मायने रखते है IPL में निवेश की गयी राशी अगर पॉवर  प्लांट बनाने के लिए प्रयोग की जाती तो 1000 MW  का एक प्लांट खड़ा किया जा सकता था। उसी पैसे से अगर नेशनल हाईवे बनाया जाता तो 532 KM का एक सुन्दर 4 लेन का हाईवे बनाया जा सकता था , वही अगर फ्लाईओवर की बात करे तो इसी राशी में पुरे 128  फ्लाईओवर बनाये जा सकते थे और अगर यही पैसा मेट्रो ट्रेन की योजना में लगाया जाये तो मेट्रो के फेज-II  का एक तिहाई काम पूरा हो सकता है

मैं यहाँ पर उद्योगपतियों और बॉलीवुड के स्टार लोगो से पैसा दान करने के लिए नहीं कह रहा हूँ अपितु सरकार की बनायीं निति BTO यानि की build operate transfer के तहत पैसा देश के विकास के लिए कर्च करने के लिए कह रहा हूँ ।

हमारे देश में कई राज्य ऐसे है जो साल में कुछ महीने सूखे से पीड़ित रहते है और देश के राजनेता लाचारो की तरह लोगो को मरता देखेने से ज्यादा कुछ नहीं करते। इसी तरह कुछ राज्य ऐसे है जहा बाढ़ की समस्या लगभग हर साल झेलनी पड़ती है । इसी समस्या से उबरने के लिए सालो पहले सरकार ने एक ऐसी परियोजना पर विचार किया जिसके तहत 9000 Km की नहरे बनाकर देश की 37 नदियों को जोड़ा जाता । लेकिन वो परियोजना आज तक शुरू नहीं हो पाई । मैं आपको बता दो की IPL  में निवेश क्या गया पैसा ही काफी है उस परियोजना को पूरा करने के लिए ।

IPL के दीवाने जो ये सोचकर की लेख एक ऐसे व्यक्ति के द्वारा लिखा गया है जो क्रिकेट को पसंद नहीं करता , इस लेख की आलोचना करना चाहते है मैं उनको बता दूँ की मैं भी क्रिकेट का दीवाना हूँ  लेकिन IPL  नहीं क्योकि IPL और क्रिकेट में बहुत अंतर है ।

Sunday, 21 April 2013

RELIGION : A PRACTICAL APPROACH


धर्म एक ऐसा धागा है जिससे हर व्यक्ति बंधे रहना चाहता है । धर्म के सहारे ही लोगो के जीवन को दिशा दी जा सकती है । हमारे देश का हर व्यक्ति मैं कहूँगा पुरे १०० प्रतिशत लोग कुछ न कुछ ऐसा करते है जिसके पीछे एक मात्र कारण धर्म है उससे ज्यादा कुछ नहीं ।

धर्म किसी आकाश से अवतरित हुयी पुस्तक का सारांश नहीं है और न ही ये कोई अंधविश्वास है । धर्म तो हमारे पूर्वजो के लाखो वर्षो  के शोध का एक अच्छा और सुंदर परिणाम है  और हमें अपने पूर्वजो का आभारी होना चाहिए क़ि हमारे जीवन को सरल और सुखी बनाने के लिए उन्होंने इतनी महनत की । सही अर्थो में देखा जाये तो धर्म  जीने का एक तरीका है । मैं एक छोटा सा उदाहरण देना चाहूँगा । हिन्दू धर्म के लोग गंगा नदी में सिक्के डालते है , पहले तो मैं भी समझ नहीं पाया था की ऐसा भला क्यों किया जाता है । लेकिन मैं आपको बता दूँ की नदी में सिक्के डालने का कारण मनुष्य के जीवन से ही सम्बंदित है । पुराने ज़माने में सिक्के ताम्बे के हुआ करते थे और ताम्बे के बर्तन में रखा हुआ पानी स्वास्थ्य के लिए लाभकारी होता है । बस उसी कारण से आज जब सिक्के ताम्बे के नहीं है फिर भी गंगा नदी में डाले जाते है । इसी तरह इस्लाम में पढ़ी जाने वाली नमाज , कुछ ऐसे योगासनों का संग्रह है जिसे अगर व्यक्ति दिन में पांच बार कर ले तो जिंदगी भर निरोगी रहे । धर्म चाहे कोई भी सभी का उद्देश्य इंसानियत की रक्षा करना है , इंसान को एक सुखी जीवन देना है । दो अलग अलग धर्मो की कोई भी बात या उपदेश एक दुसरे के विपरीत नहीं होते ।

अब सवाल खड़ा होता है क़ि अगर  धर्म इंसान के हक के लिए है तो फिर धर्म के कारण इतने दंगे फसाद क्यों होते है ? क्यों किसी धर्म का पालन करने में इतनी मसक्कत करनी पड़ती है ? क्यों धर्म के कारण कभी कभी गर्मी में भी पुरे बदन पर मोटा लिबास पहना पड़ता है ? कारण है हम लोगो के धर्म गुरु जो हमें दिशा देते है जो हमारे धर्म में क्या होना चाहिए क्या नहीं इस बात का फैसला करते है ।

क्योकि धर्म इंसान के जीवन को सुखी बनाने के लिए है इसीलिए समय के साथ इसमें बदलाव  क़ि जरुरत थी। वो बदलाव करना भी आसान नहीं है पुरे शोध के बाद ही बदलाव किया जा सकता है । और हमारे धर्म गुरुओं को तो धर्म के नाम पर अंधविश्वास फेलाने से ही फुर्सत नहीं है शोध कहा से करेंगे । जिस प्रकार सिक्के का धातु (जिसका सिक्का बनता है ) के बदलने के साथ ही नदी में सिक्के डालने क़ी परंपरा को बदलना जरुरी था उसी प्रकार हर धर्म में समय के साथ बदलाव लाना जरुरी है । धर्म में बदलाव लाने से ही उसके उद्देश्य क़ी रक्षा क़ी जा सकती है ।

धर्म का उद्देश्य कभी भी लोगो के बीच दीवार खड़ा करना नहीं है अपितु धर्म तो लोगो को मिलाता है , एक दुसरे के सुख दुःख को समझे क़ी प्रेरणा देता है । इसिलए आज जरुरत है क़ि हमारे धर्म गुरु सभी प्रकार क़ी राजनीति से मुक्त होकर धर्म में जरुरी बदलाव लाये ।
  

Friday, 12 April 2013

IS CORRUPTION A MAIN PROBLEM OF OUR COUNTRY ?

करप्शन यानि के भ्रष्टाचार एक ऐसा शब्द है जिससे देश का हर नागरिक भली भाति वाकिफ है , देश का हर एक नागरिक भ्रष्टाचार को जानता है समझता है और उसके हर एक रूप को पहचानता है लेकिन फिर भी जाने क्यों इसकी मात्रा में तनिक भी कमी नहीं आती जितने ज्यादा लोग भ्रष्टाचार से दिन पे दिन अवगत हो रहे है ये उतना ही बढता जा रहा है दिल्ली में अन्ना जी का आन्दोलन हुआ , अरविन्द जी भूखे प्यासे शासन से लड़े लेकिन भ्रष्टाचार में फिर भी कोई कमी नहीं आई इतने ज्यादा मात्रा में लोगो ने अरविन्द जी का साथ दिया , भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज़ उठाई लेकिन जाने उनकी आवाज़ दानव की किस दहाड़ ने दवा दी

मेरा देश शायद ही भ्रष्टाचार से आजाद हो पाए क्योकि भ्रष्टाचार मेरे देश कि मुख्य समस्या है ही नहीं   मेरे देश कि मुख्य समस्या है, तो हम सब देश वासियों कि देश भक्ति आज देश भक्ति के नाम पर सिर्फ लोग २६ जनवरी और १५ अगस्त हो तिरंगा फेहराते है और जो ज्यादा देश भक्त होते है वो दिल्ली जाकर परेड भी देखते है मैं पूरे दावे से कह सकता हूँ कि जितने लोग अन्ना जी के अगस्त आन्दोलन में आये थे अगर उतने ही लोग आन्दोलन में आने कि बजाये, भ्रष्टाचार करने का प्रण लेकर उस पर अमल करते तो शायद, कम से कम दिल्ली से तो भ्रष्टाचार निश्चय ही कुछ कम हो जाता

आज हम अपने देश से ज्यादा अपनी जाति , अपने धर्म , अपने समुदाय , अपने क्षेत्र , अपनी भाषा (जो आधे से ज्यादा भारतियों की हिंदी नहीं है ) प्यार करते है सबसे कम अगर हम किसी को प्यार करते है तो शायद वो अभागा देश ही है देश जनसंख्या विस्पोट के नज़दीक है लेकिन हम अपनी कॊम , अपने लोग, अपने समुदाय की तरक्की और सुरक्षा का हवाला देते हुए ऐसा कोई कदम उठाने को तैयार नहीं जिससे उसकी वृद्धि में कुछ कमी आये

Saturday, 16 March 2013

Our Media person should know whom they are talking to.

हाल ही में एक साक्षात्कार के दॊरान श्रीमान काटजू जी ने दीपक चौरसिया को बाहर का रास्ता दिखा दिया । श्रीमान काटजू अपनी वाक्पटुता के लिए जाने जाते है और शायद वो ही ऐसे इकलोते व्यक्ति है जो छवि की चिंता से मुक्त होकर सवालो का जवाब देते है ।

हमारी मीडिया के बारे में जो कुछ भी काटजू साहब ने कहा उसमे शायद ही कुछ गलत हो । मीडिया के बारे में एक बात मैं भी यहाँ पर बोलना चाहूँगा । मैंने जितने भी साक्षात्कार आज तक देखे है चाहे वो देश के राष्ट्रपति का हो या प्रधानमंत्री का , उनमे मुझे पत्रकार की आँखों में कभी सम्मान नहीं दिखा । बयान चाहे राष्ट्रपति का हो या प्रधानमंत्री का पत्रकार को वो अधूरा और असत्य ही लगता है । यही शक करने की आदत देश के लगभग सभी पत्रकारों में फ़ैल चुकी है ।

समय की तो जैसे हमारे मीडिया वालो के पास कोई कमी ही नहीं है । बाहर का रास्ता देखने के बाद दीपक जी ने 6 लोगो को एकत्रित कर काटजू साहब की जम के आलोचना की वो भी स्टूडियो से सीधा प्रसारण । शायद नहीं निश्चय ही वो दीपक जी का खुद को सही और काटजू जी को गलत साबित करने का प्रयास था ।

मैं ये नहीं कह रहा हूँ की काटजू जी ने सही व्यवहार किया, लेकिन मैं दीपक जी के व्यवहार से भी पूरी तरह सहमत नहीं हूँ । दीपक जी ही नहीं सभी पत्रकारों का यही रवैया बन गया है की वो सामने वाले को पूरी बात बोलने ही नहीं देते और अपने आरोपों का सिलसिला शुरू कर देते है । यही हुआ काटजू जी के साक्षात्कार के दोरान ।

काटजू जी के साक्षात्कार के दॊरन हुयी आशिष्टता और उसके बाद दीपक जी द्वारा 6 लोगो के साथ मिलकर काटजू जी की आलोचना करना सीधे हमारी मीडिया की गुणवत्ता पर सवाल खड़ा करता है।

Saturday, 2 March 2013

THE ATTACK OF 26/11

कुछ सरफिरे लोग पूरे विश्व में एक ही मज़हब देखना चाहते है, और उनकी यही चाहत उन्हें आतंकवाद फ़ैलाने पर मजबूर कर रही है। वो इस कुकर्म को जिहाद के नाम पर करते है। उन्ही सरफिरे लोगो को मै ये बताना चाहता हूँ कि तुम्हे छोड़ कर पूरे विश्व में सब लोग एक ही मज़हब को मानते है और वो है इंसानियत।

रामगोपाल वर्मा द्वारा निर्देशित फीचर फिल्म ने उस दुःख, पीड़ा का एहसास कराया जो इन सिरफिरे लोगो ने बिना किसी गलती के हमे दी। उन आतंकवादियों को शायद इस बात का एहसास नहीं था कि जिस भयानक खेल को उन लोगो ने खुदा कि इबादात के रूप में खेला उसे देखकर तो खुदा भी उस दिन बहुत रोया होगा।

इन आतंकवादियों को केवल शारीरिक प्रशिक्षण दिया जाता है अपितु उन्हें मानसिक रूप से बीमार भी बना दिया जाता है। जिहाद का एक गलत मतलब उनके दिमाग में डाल दिया जाता है। ऐसे में किसी आतंकवादी को मारने से, केवल बात नहीं बनती। आतंकवादी को मारने से हमारे देश के खिलाफ काम कर रहे लोगो कि मानसिकता में कोई सुधार नहीं होता। जरुरत है उन आतंकवादी संगठनों को जड़ से उखाड़ फेकने क़ी, उस मानसिकता को नष्ट करने क़ी।

आतंकवाद चाहे बाहरी हो या आंतरिक, उसको नष्ट करने के लिए किसी क़ी सहमती क़ी जरूरत नहीं है। उसको हर हाल में नष्ट करना है चाहे प्यार से या डंडे के बल पर। उदहारण के लिए, जब अमेरिका पर आतंकवादी हमला हुआ तो उसने लादेन को पकड़ने के लिए दिन रात एक कर दिया। अपने सैनिको को अफगानिस्तान में बैठा कर रखा। हमारे देश को भी अमेरिका से सीख लेनी चाहिए और हर उस संगठन का खात्मा कर देना चाहिए जो हमारे देश के खिलाफ काम करता है। इस काम को करने के लिए हमें किसी अन्य देश क़ी सहमती क़ी जरुरत नहीं क्योकि जब ये संगठन आतंकवादी गतिविधियाँ करते है तो हम लोग अपने भाई, बहिन, माँ, बाप खोते है; वो देश नहीं| अन्य देश क़ी सहमती से मेरा मतलब उस अंतरराष्ट्रीय दबाव से है जो हर बार हमारे देश को इन आतंकवादी संगठनो के खिलाफ ठोस कदम लेने से रोक देता है।