Saturday, 16 March 2013

Our Media person should know whom they are talking to.

हाल ही में एक साक्षात्कार के दॊरान श्रीमान काटजू जी ने दीपक चौरसिया को बाहर का रास्ता दिखा दिया । श्रीमान काटजू अपनी वाक्पटुता के लिए जाने जाते है और शायद वो ही ऐसे इकलोते व्यक्ति है जो छवि की चिंता से मुक्त होकर सवालो का जवाब देते है ।

हमारी मीडिया के बारे में जो कुछ भी काटजू साहब ने कहा उसमे शायद ही कुछ गलत हो । मीडिया के बारे में एक बात मैं भी यहाँ पर बोलना चाहूँगा । मैंने जितने भी साक्षात्कार आज तक देखे है चाहे वो देश के राष्ट्रपति का हो या प्रधानमंत्री का , उनमे मुझे पत्रकार की आँखों में कभी सम्मान नहीं दिखा । बयान चाहे राष्ट्रपति का हो या प्रधानमंत्री का पत्रकार को वो अधूरा और असत्य ही लगता है । यही शक करने की आदत देश के लगभग सभी पत्रकारों में फ़ैल चुकी है ।

समय की तो जैसे हमारे मीडिया वालो के पास कोई कमी ही नहीं है । बाहर का रास्ता देखने के बाद दीपक जी ने 6 लोगो को एकत्रित कर काटजू साहब की जम के आलोचना की वो भी स्टूडियो से सीधा प्रसारण । शायद नहीं निश्चय ही वो दीपक जी का खुद को सही और काटजू जी को गलत साबित करने का प्रयास था ।

मैं ये नहीं कह रहा हूँ की काटजू जी ने सही व्यवहार किया, लेकिन मैं दीपक जी के व्यवहार से भी पूरी तरह सहमत नहीं हूँ । दीपक जी ही नहीं सभी पत्रकारों का यही रवैया बन गया है की वो सामने वाले को पूरी बात बोलने ही नहीं देते और अपने आरोपों का सिलसिला शुरू कर देते है । यही हुआ काटजू जी के साक्षात्कार के दोरान ।

काटजू जी के साक्षात्कार के दॊरन हुयी आशिष्टता और उसके बाद दीपक जी द्वारा 6 लोगो के साथ मिलकर काटजू जी की आलोचना करना सीधे हमारी मीडिया की गुणवत्ता पर सवाल खड़ा करता है।

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