करप्शन यानि के
भ्रष्टाचार एक ऐसा
शब्द है जिससे
देश का हर
नागरिक भली भाति
वाकिफ है , देश
का हर एक
नागरिक भ्रष्टाचार को जानता
है समझता है
और उसके हर
एक रूप को
पहचानता है लेकिन
फिर भी न
जाने क्यों इसकी
मात्रा में तनिक
भी कमी नहीं
आती । जितने
ज्यादा लोग भ्रष्टाचार
से दिन पे
दिन अवगत हो
रहे है ये
उतना ही बढता
जा रहा है
। दिल्ली में
अन्ना जी का
आन्दोलन हुआ , अरविन्द जी
भूखे प्यासे शासन
से लड़े लेकिन
भ्रष्टाचार में फिर
भी कोई कमी
नहीं आई ।
इतने ज्यादा मात्रा
में लोगो ने
अरविन्द जी का
साथ दिया , भ्रष्टाचार
के खिलाफ आवाज़
उठाई लेकिन न
जाने उनकी आवाज़
दानव की किस
दहाड़ ने दवा
दी ।
मेरा देश शायद
ही भ्रष्टाचार से
आजाद हो पाए
क्योकि भ्रष्टाचार मेरे देश
कि मुख्य समस्या
है ही नहीं ।
मेरे देश कि
मुख्य समस्या है,
तो हम सब
देश वासियों कि
देश भक्ति ।
आज देश भक्ति
के नाम पर
सिर्फ लोग २६
जनवरी और १५
अगस्त हो तिरंगा
फेहराते है और
जो ज्यादा देश
भक्त होते है
वो दिल्ली जाकर
परेड भी देखते
है । मैं
पूरे दावे से
कह सकता हूँ
कि जितने लोग
अन्ना जी के
अगस्त आन्दोलन में
आये थे अगर
उतने ही लोग
आन्दोलन में आने
कि बजाये, भ्रष्टाचार
न करने का
प्रण लेकर उस
पर अमल करते
तो शायद, कम
से कम दिल्ली
से तो भ्रष्टाचार
निश्चय ही कुछ
कम हो जाता
।
आज हम अपने देश से ज्यादा अपनी जाति , अपने धर्म , अपने समुदाय , अपने क्षेत्र , अपनी भाषा (जो आधे से ज्यादा भारतियों की हिंदी नहीं है ) प्यार करते है । सबसे कम अगर हम किसी को प्यार करते है तो शायद वो अभागा देश ही है । देश जनसंख्या विस्पोट के नज़दीक है लेकिन हम अपनी कॊम , अपने लोग, अपने समुदाय की तरक्की और सुरक्षा का हवाला देते हुए ऐसा कोई कदम उठाने को तैयार नहीं जिससे उसकी वृद्धि में कुछ कमी आये ।
आज हम अपने देश से ज्यादा अपनी जाति , अपने धर्म , अपने समुदाय , अपने क्षेत्र , अपनी भाषा (जो आधे से ज्यादा भारतियों की हिंदी नहीं है ) प्यार करते है । सबसे कम अगर हम किसी को प्यार करते है तो शायद वो अभागा देश ही है । देश जनसंख्या विस्पोट के नज़दीक है लेकिन हम अपनी कॊम , अपने लोग, अपने समुदाय की तरक्की और सुरक्षा का हवाला देते हुए ऐसा कोई कदम उठाने को तैयार नहीं जिससे उसकी वृद्धि में कुछ कमी आये ।
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