कुछ सरफिरे लोग पूरे
विश्व में एक
ही मज़हब देखना
चाहते है, और
उनकी यही चाहत
उन्हें आतंकवाद फ़ैलाने पर
मजबूर कर रही
है। वो इस
कुकर्म को जिहाद
के नाम पर
करते है। उन्ही
सरफिरे लोगो को
मै ये बताना
चाहता हूँ कि
तुम्हे छोड़ कर
पूरे विश्व में
सब लोग एक
ही मज़हब को
मानते है और
वो है इंसानियत।
रामगोपाल वर्मा द्वारा निर्देशित
फीचर फिल्म ने
उस दुःख, पीड़ा
का एहसास कराया
जो इन सिरफिरे
लोगो ने बिना
किसी गलती के
हमे दी। उन
आतंकवादियों को शायद
इस बात का
एहसास नहीं था
कि जिस भयानक
खेल को उन
लोगो ने खुदा
कि इबादात के
रूप में खेला
उसे देखकर तो
खुदा भी उस
दिन बहुत रोया
होगा।
इन आतंकवादियों
को न केवल
शारीरिक प्रशिक्षण दिया जाता
है अपितु उन्हें
मानसिक रूप से
बीमार भी बना
दिया जाता है।
जिहाद का एक
गलत मतलब उनके
दिमाग में डाल
दिया जाता है।
ऐसे में किसी
आतंकवादी को मारने
से, केवल बात
नहीं बनती। आतंकवादी
को मारने से
हमारे देश के
खिलाफ काम कर
रहे लोगो कि
मानसिकता में कोई
सुधार नहीं होता।
जरुरत है उन
आतंकवादी संगठनों को जड़
से उखाड़ फेकने
क़ी, उस मानसिकता
को नष्ट करने क़ी।
आतंकवाद चाहे बाहरी
हो या आंतरिक,
उसको नष्ट करने
के लिए किसी
क़ी सहमती क़ी
जरूरत नहीं है।
उसको हर हाल
में नष्ट करना
है चाहे प्यार
से या डंडे
के बल पर।
उदहारण के लिए,
जब अमेरिका पर
आतंकवादी हमला हुआ
तो उसने लादेन
को पकड़ने के
लिए दिन रात
एक कर दिया।
अपने सैनिको को
अफगानिस्तान में बैठा
कर रखा। हमारे
देश को भी
अमेरिका से सीख
लेनी चाहिए और
हर उस संगठन
का खात्मा कर
देना चाहिए जो
हमारे देश के
खिलाफ काम करता
है। इस काम
को करने के
लिए हमें किसी
अन्य देश क़ी
सहमती क़ी जरुरत
नहीं क्योकि जब
ये संगठन आतंकवादी
गतिविधियाँ करते है
तो हम लोग
अपने भाई, बहिन,
माँ, बाप खोते
है; वो देश
नहीं| अन्य देश क़ी सहमती से मेरा मतलब
उस अंतरराष्ट्रीय दबाव से है जो हर बार हमारे देश को इन आतंकवादी संगठनो के खिलाफ ठोस
कदम लेने से रोक देता है।
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